जड़ी-बूटियों, सत्तू और चावल के आटे से तैयार होता है पारंपरिक ‘सूर’

पुरखों से चली आ रही विधि में झलकती है पहाड़ी लोक संस्कृति और आस्था की अनमोल विरासत

रामपुर बुशहर,6 सितंबर मीनाक्षी 

पहाड़ी क्षेत्रों की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं में आज भी कई ऐसी पारंपरिक विधियां जीवंत हैं, जो पीढ़ियों से लोगों की आस्था और जीवनशैली का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में से एक है पारंपरिक ‘सूर’ तैयार करने की विधि, जिसमें विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है।

पारंपरिक विधि के अनुसार पहले कई तरह की जड़ी-बूटियों को मिलाया जाता है। इसके बाद इसमें सत्तू और चावल का आटा मिलाकर सूर तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय ज्ञान और पुरखों से चली आ रही परंपरा की झलक देखने को मिलती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि सूर बनाने की यह परंपरा केवल एक विधि नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की लोक संस्कृति, आस्था और पारंपरिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बदलते दौर में भी इस तरह की परंपराओं का संरक्षण नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

देव परंपराओं और स्थानीय आस्था से जुड़ी यह विरासत आज भी लोगों के बीच श्रद्धा और सम्मान के साथ निभाई जा रही है। जरूरत है कि आने वाली पीढ़ियों तक इन पारंपरिक विधियों और लोक संस्कृति को सुरक्षित रूप से पहुंचाया जाए।

बूटियों और अनाज से तैयार होता है पारंपरिक ‘सूर’पहाड़ी संस्कृति और देव परंपराओं से जुड़ा है सदियों पुराना पारंपरिक पेय

 हिमाचल की पहाड़ी संस्कृति में खान-पान की अनेक ऐसी पारंपरिक विधियां आज भी प्रचलित हैं, जिनमें स्थानीय लोगों का पारंपरिक ज्ञान और देव आस्था झलकती है। इन्हीं में से एक है ‘सूर’ तैयार करने की पारंपरिक विधि

स्थानीय परंपरा के अनुसार सूर तैयार करने में विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद इसमें सत्तू और चावल का आटा मिलाया जाता है। पारंपरिक प्रक्रिया के तहत तैयार किया जाने वाला यह पेय स्थानीय रीति-रिवाजों और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

बुजुर्गों के अनुसार सूर बनाने की यह विधि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आई है। इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और प्रक्रिया में स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों तथा पारंपरिक जीवनशैली की झलक मिलती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी पारंपरिक विधियां केवल खान-पान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके साथ लोक संस्कृति, देव परंपरा और सामुदायिक आस्था भी जुड़ी रहती है। आधुनिक दौर में इन परंपराओं को संरक्षित करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पुरखों के पारंपरिक ज्ञान से परिचित हो सके।

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