शिमला, 30 अक्तूबर मीनाक्षी
हिमाचल प्रदेश राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद् (हिमकॉस्ट) द्वारा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से “आर्द्रभूमि के संरक्षण एवं विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग हेतु उत्तरी क्षेत्रों की सहभागिता” विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ होटल हॉलिडे होम, शिमला में हुआ।
कार्यशाला में पंजाब, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, चण्डीगढ़, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधियों के साथ-साथ ज्ञान साझेदारों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य देशभर में वैटलैंड्स (आर्द्रभूमियों) के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग के बेहतर तरीकों को साझा करना और विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। हिमाचल प्रदेश राज्य वैटलैंड्स अथॉरिटी के संयुक्त सदस्य सचिव डॉ. सुरेश चन्द अत्री ने स्वागत भाषण देते हुए हिमाचल प्रदेश में अब तक किए गए वैटलैंड संरक्षण कार्यों की जानकारी दी और सभी प्रतिभागियों से मिलकर ठोस नीति बनाने का आह्वान किया।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त सचिव श्री वेद प्रकाश ने दिल्ली से वर्चुअल माध्यम से जुड़कर उद्घाटन भाषण दिया। उन्होंने मिशन ‘सहभागिता’ की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ‘समग्र समाज’ और ‘समग्र सरकार’ दृष्टिकोण के साथ देश की आर्द्रभूमियों का संरक्षण एवं प्रबंधन करना है।
मुख्य भाषण में हिमाचल प्रदेश सरकार के पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव श्री सुशील कुमार सिंगला ने कहा कि वैटलैंड्स भारत की सांस्कृतिक और पारिस्थितिक विविधता का दर्पण हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश की रेणुका और पोंग डैम जैसी आर्द्रभूमियों को इको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर बल दिया।
इस अवसर पर विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने प्रदेशों में वैटलैंड्स के संरक्षण एवं प्रबंधन के अनुभव साझा किए। विशेषज्ञों ने हिमालयी राज्यों में पीटलैंड इन्वेंटरी, रामसर रणनीतिक योजना और जैव विविधता कार्ययोजना से जुड़ी प्रस्तुतियाँ दीं।
कार्यक्रम में प्रधान मुख्य अरण्यपाल (वन विभाग) श्री संजय सूद और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स) ने हिमाचल की पारिस्थितिक विविधता और आर्द्रभूमियों के संरक्षण में वन विभाग की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि अधिकांश आर्द्रभूमियाँ वन क्षेत्रों के अंतर्गत आती हैं, इसलिए क्षेत्रीय प्रबंधकों का सक्रिय सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
कार्यशाला के दूसरे दिन 31 अक्तूबर को प्रतिभागियों को रेणुका वैटलैंड का भ्रमण कराया जाएगा, जहाँ उन्हें आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन में आने वाली चुनौतियों से अवगत कराया जाएगा।
कार्यक्रम का समापन हिमाचल प्रदेश राज्य वैटलैंड अथॉरिटी के वैज्ञानिक अधिकारी श्री रवि शर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

