हांगो के गेहूं के बाद अब सेब की आनुवंशिक क्षमता जांचने की तैयारी

वैज्ञानिक संवाद में स्थानीय फसलों और बागवानी किस्मों के संरक्षण पर जोर, रोग प्रतिरोधी गुणों की खोज पर होगा फोकस

किन्नौर, 15 सितंबर मीनाक्षी

किन्नौर के हांगो में कृषि एवं बागवानी की स्थानीय आनुवंशिक संपदा के संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग को लेकर वैज्ञानिक संवाद एवं जागरूकता कैंप आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ICAR–IIWBR के वैज्ञानिकों ने स्थानीय कृषि विरासत को संरक्षित कर आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ने पर चर्चा की।

कैंप में डॉ. अरुण गुप्ता, डॉ. प्रदीप शर्मा, डॉ. प्रमोद प्रसाद तथा पूह के SMS (Horticulture) डॉ. देव राज कैथ ने स्थानीय कृषि और बागवानी संसाधनों की वैज्ञानिक क्षमता पर विचार साझा किए।

वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 2004-05 में हांगो से एकत्र किए गए गेहूं के स्थानीय जर्मप्लाज्म में ब्राउन रस्ट और ब्लैक रस्ट के प्रति रोग प्रतिरोधी गुण पाए गए थे। अब इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया को हांगो की पुरानी और स्थानीय सेब किस्मों तक ले जाने की जरूरत पर बल दिया जा रहा है।

स्थानीय सेब की किस्मों की पहचान कर उनका संरक्षण, रोगों के प्रति परीक्षण और जीनोमिक अध्ययन किया जा सकता है। इसके बाद उपयोगी रोग-प्रतिरोधी जीन की पहचान कर आधुनिक प्लांट ब्रीडिंग में उनका इस्तेमाल संभव होगा। इससे भविष्य में रोग प्रतिरोधी, बदलती जलवायु के अनुकूल और कम रसायनों पर निर्भर सेब की नई किस्मों के विकास की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

वहीं, हांगो से प्राप्त रोग प्रतिरोधी गेहूं के गुणों के लिए संबंधित किसानों को सम्मानित करने की योजना भी है। जानकारी के अनुसार इस वैज्ञानिक उपलब्धि से जुड़े किसानों का चयन कर उन्हें दस लाख रुपये तक के पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की प्रक्रिया प्रस्तावित है।

वैज्ञानिक संवाद में यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि हांगो ने गेहूं के क्षेत्र में अपनी आनुवंशिक क्षमता साबित की है। अब स्थानीय सेब की किस्मों को भी वैज्ञानिक कसौटी पर परखकर उनकी आनुवंशिक विशेषताओं को सामने लाने का समय है। इससे हिमालयी क्षेत्रों की पारंपरिक बागवानी विरासत को संरक्षित करने के साथ भविष्य की टिकाऊ सेब उत्पादन तकनीक को भी बढ़ावा मिल सकता है।

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