14 किमी की कठिन पैदल चढ़ाई कर झील पहुंचीं उपायुक्त किरण भड़ाना, 15 सदस्यीय टीम ने किया स्थल निरीक्षण
केलांग, 23 सितंबर मीनाक्षी
लाहौल-स्पीति की घेपन ग्लेशियल झील के बढ़े जलस्तर को लेकर जिला प्रशासन ने निगरानी और एहतियाती तैयारियां तेज कर दी हैं। संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम को देखते हुए उपायुक्त एवं अध्यक्ष जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) किरण भड़ाना ने मंगलवार को स्वयं झील का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने सिस्सु से करीब 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई कर लगभग 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित झील तक पहुंचकर जलस्तर, आसपास के भू-भाग और संभावित जल बहाव मार्ग का निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान विभिन्न विभागों के 15 अधिकारी-कर्मचारी उपायुक्त के साथ मौजूद रहे। टीम ने झील की मौजूदा स्थिति, भौगोलिक परिस्थितियों और संभावित जोखिमों का जायजा लिया। साथ ही बढ़े हुए जलस्तर को सुरक्षित तरीके से कम करने की संभावनाओं और आपदा की स्थिति में अपनाई जाने वाली कार्ययोजना पर भी मंथन किया गया।
उपायुक्त ने अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी आधार पर झील तथा आसपास के ग्लेशियरों की स्थिति का आकलन करने के निर्देश दिए। अत्यधिक दुर्गम क्षेत्र होने के कारण टीम के अन्य सदस्यों के लिए झील के नीचे बेस कैंप में रात्रि विश्राम की व्यवस्था की गई, जबकि उपायुक्त निरीक्षण के बाद मंगलवार को ही वापस लौट आईं।
पांच मिनट में आबादी तक पहुंच सकता है पानी
उपायुक्त किरण भड़ाना ने बताया कि अब तक किए गए आकलनों में आपदा की स्थिति में झील का पानी नीचे आबादी वाले क्षेत्रों तक करीब 22 मिनट में पहुंचने की संभावना जताई गई है। हालांकि, मौके की भौगोलिक एवं व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन का आकलन है कि पानी इससे भी कम समय, करीब पांच मिनट में संवेदनशील आबादी तक पहुंच सकता है।
उन्होंने कहा कि इस संभावित जोखिम को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना तैयार करना, नियमित जागरूकता कार्यक्रम और मॉक ड्रिल करवाना तथा त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी
प्रशासन घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में भी कार्य कर रहा है। प्रस्तावित प्रणाली से झील के जलस्तर समेत अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी और वास्तविक समय में सूचना प्राप्त करने में मदद मिलेगी। सी-डैक, तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित प्रणाली का सिस्सु झील में परीक्षण भी किया जा चुका है।
उपायुक्त ने कहा कि घेपन झील के आसपास बड़ी संख्या में ग्लेशियर और पर्वतीय क्षेत्र हैं। इनकी स्थिरता की नियमित वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। इसके लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ समन्वय किया जाएगा। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की विशेषज्ञ टीम भी झील और आसपास के क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है।
उन्होंने कहा कि ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में तेजी से बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों को देखते हुए पूर्व तैयारी, निरंतर निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और विभागों के बीच बेहतर समन्वय ही संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने का आधार हैं। प्रशासन का उद्देश्य आपदा आने का इंतजार करने के बजाय पहले से जोखिमों की पहचान कर प्रभावी कार्ययोजना तैयार करना है।
निरीक्षण टीम में परियोजना अधिकारी आईटीडीपी अश्वनी कुमार शर्मा, उप वन क्षेत्रपाल लीला मणि, चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुषमा व डॉ. विक्रांत नेगी, बीआरओ 94 आरसीसी के प्रभारी अधिकारी कैप्टन हरिओम शरण, अग्निशमन केंद्र केलांग के प्रभारी रतन चंद, होमगार्ड फायरमैन छेरिंग आंगरुप, आईटीडीपी के अजीत सिंह, जल शक्ति विभाग के कनिष्ठ अभियंता पंकज महाजन व पंप अटेंडेंट अरविंद कुमार, एचपीएसईबीएल के वरिष्ठ सहायक संजय कुमार व कनिष्ठ सहायक रोबिन, वन रक्षक बलवीर सिंह तथा निजी सुरक्षा अधिकारी ईश्वर दास शामिल रहे।

