सीएसआईआर-आईएचबीटी पालमपुर ने पहली बार मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की सफल खेती कर पेश की नई मिसाल, 750 ग्राम तक वजन वाले फलों की हुई पैदावार
पालमपुर, 6 नवंबर मीनाक्षी
हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए बागवानी के क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगी है। अब प्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी ड्रैगन फ्रूट की खेती संभव हो सकेगी। सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (सीएसआईआर-आईएचबीटी), पालमपुर ने वैज्ञानिक परीक्षण के बाद मध्य पहाड़ी क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की सफल खेती और पहली फसल तैयार कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
यह उपलब्धि संस्थान के निदेशक डॉ. सुदेश कुमार यादव के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने हासिल की है। इससे पहले ड्रैगन फ्रूट को मुख्य रूप से गर्म जलवायु वाले मैदानी क्षेत्रों की फसल माना जाता था। ऐसे में वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने के लिए प्रयोग शुरू किया कि क्या हिमाचल के ठंडे मौसम और पहाड़ी परिस्थितियों में भी इसकी खेती की जा सकती है।
जानकारी के अनुसार, इस परियोजना का परीक्षण 10 मई 2025 को कुछ पौधों की कटिंग लगाकर शुरू किया गया था। इसके लिए विशेष सहारा संरचना तैयार की गई। वैज्ञानिकों ने सर्दियों में पड़ने वाले पाले, कम तापमान और मानसून के दौरान होने वाली अधिक बारिश के बीच पौधों की वृद्धि पर लगातार नजर रखी। इस दौरान विभिन्न प्रयोग किए गए और पौधों के विकास से जुड़े आंकड़े दर्ज कर परिणामों का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन किया गया।
करीब डेढ़ साल की मेहनत के बाद 4 नवंबर 2026 को ड्रैगन फ्रूट की पहली फसल तैयार हुई। इसके फल आकार, रंग और गुणवत्ता के लिहाज से बेहद बेहतर पाए गए। इन फलों का वजन 750 ग्राम तक दर्ज किया गया, जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पैदा होने वाले ड्रैगन फ्रूट की गुणवत्ता के बराबर है।
इस सफलता से हिमाचल के छोटे और सीमांत किसानों के लिए बागवानी का एक नया विकल्प खुल सकता है। ड्रैगन फ्रूट उच्च मूल्य वाली फसल है और इसकी खेती से कम भूमि में भी किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाएं हैं। इसे कम पानी की आवश्यकता वाली फसल माना जाता है, जिससे टिकाऊ और जलवायु के अनुकूल कृषि को भी बढ़ावा मिल सकता है।
सीएसआईआर-आईएचबीटी अब इसकी खेती की तकनीक को और बेहतर बनाने पर काम करेगा, ताकि प्रदेश के अधिक से अधिक किसान वैज्ञानिक तरीके से ड्रैगन फ्रूट की खेती कर सकें। यह उपलब्धि हिमाचल में पारंपरिक खेती के साथ-साथ नई नकदी फसलों को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

